दिनांक- २७.०८.२००२
आइस - पाइस
बरसों पहले,
खेला हमने
'मैंने और ईश्वर ने'
आइस पाइस।
ईश्वर बड़ा था न
सो,
दी उसने आज्ञा
ढूंढ़ो तुम
छुपुंगा मैं,
और छुप गया वो।
मैंने गिनती गिनी,
जो मुझे ५० तक याद थी
और फिर ढूंढा।
दरवाज़े के पीछे,
परदे के पीछे,
आलमारी में,
किताबों में,
और अपने औजार - बॉक्स में भी,
दिल में, दिमाग में,
पड़ोस वाली चाची के घर में,
तस्वीरों में,
पेड़ों पर,
हर जगह ढूंढा उसे।
और तो और
सपने भी खंगाल लिए,
अपनी बछिया से भी पूछा,
आईने में भी देखा।
झाँका
घोसलों और बिलों में भी...
अपनी दुनिया का हर कोना छाना।
नहीं मिला वो
अंत में,
मैं रोई, चिल्लाई;
ईश्वर!
बाहर निकलो न
मैं थक गयी
तुम गलत खेल रहे हो;
धमकी भी दी मैंने उसे,
मम्मी से कह दूंगी,
'कुट्टी' भी कहा।
पर, वो नहीं आया...
और,
और समय बीता
मैं बड़ी हुयी
और शायद,
ईश्वर और भी बड़ा हुआ।
फिर
मैं भूलने लगी,
याद नहीं रहा,
कभी
खोया था ईश्वर
मेरे ही हाथों
मेरे ही साथ खेलते हुए...
आज,
अचानक,
सोने से कुछ पहले
ख़याल आया,
याद आई उसकी,
उस ईश्वर की
जिसे मैं प्यार करती थी।
मैं रोई कुछ,
कुछ मुस्कुरायी
और कुछ शरमाई
'अब बड़ी जो हो गयी थी'।
सोचा,
सच! कहाँ गया ईश्वर,
काश...।
आधी रात,
बिलकुल आधी,
मैंने करवट ली,
शायद ईश्वर की खिलखिलाहट
आँखें मली मैंने,
बिस्तर के नीचे झाँका,
चोटी भी नीचे लटकी,
दो आँखें चमकी
और कुछ सुन्दर, सुडौल दांत भी चमके;
मैं कुछ जानती
समझती
डरती
विश्वास करती
इससे पहले ही
वो खिसका अपनी जगह से,
पकड़ी मेरी चोटी
और कहा
'टिप...'॥
-शिखा
आइस - पाइस
बरसों पहले,
खेला हमने
'मैंने और ईश्वर ने'
आइस पाइस।
ईश्वर बड़ा था न
सो,
दी उसने आज्ञा
ढूंढ़ो तुम
छुपुंगा मैं,
और छुप गया वो।
मैंने गिनती गिनी,
जो मुझे ५० तक याद थी
और फिर ढूंढा।
दरवाज़े के पीछे,
परदे के पीछे,
आलमारी में,
किताबों में,
और अपने औजार - बॉक्स में भी,
दिल में, दिमाग में,
पड़ोस वाली चाची के घर में,
तस्वीरों में,
पेड़ों पर,
हर जगह ढूंढा उसे।
और तो और
सपने भी खंगाल लिए,
अपनी बछिया से भी पूछा,
आईने में भी देखा।
झाँका
घोसलों और बिलों में भी...
अपनी दुनिया का हर कोना छाना।
नहीं मिला वो
अंत में,
मैं रोई, चिल्लाई;
ईश्वर!
बाहर निकलो न
मैं थक गयी
तुम गलत खेल रहे हो;
धमकी भी दी मैंने उसे,
मम्मी से कह दूंगी,
'कुट्टी' भी कहा।
पर, वो नहीं आया...
और,
और समय बीता
मैं बड़ी हुयी
और शायद,
ईश्वर और भी बड़ा हुआ।
फिर
मैं भूलने लगी,
याद नहीं रहा,
कभी
खोया था ईश्वर
मेरे ही हाथों
मेरे ही साथ खेलते हुए...
आज,
अचानक,
सोने से कुछ पहले
ख़याल आया,
याद आई उसकी,
उस ईश्वर की
जिसे मैं प्यार करती थी।
मैं रोई कुछ,
कुछ मुस्कुरायी
और कुछ शरमाई
'अब बड़ी जो हो गयी थी'।
सोचा,
सच! कहाँ गया ईश्वर,
काश...।
आधी रात,
बिलकुल आधी,
मैंने करवट ली,
शायद ईश्वर की खिलखिलाहट
आँखें मली मैंने,
बिस्तर के नीचे झाँका,
चोटी भी नीचे लटकी,
दो आँखें चमकी
और कुछ सुन्दर, सुडौल दांत भी चमके;
मैं कुछ जानती
समझती
डरती
विश्वास करती
इससे पहले ही
वो खिसका अपनी जगह से,
पकड़ी मेरी चोटी
और कहा
'टिप...'॥
-शिखा