शनिवार, 23 जून 2012

                                                 दिनांक- २७.०८.२००२

आइस - पाइस
                                     

बरसों पहले,
खेला हमने
'मैंने और ईश्वर ने'
आइस पाइस
ईश्वर बड़ा था न
सो,
दी उसने आज्ञा
ो तुम
छुपुंगा मैं,
और छुप गया वो
मैंने गिनती गिनी,
जो मुझे ५० तक याद थी
और फिर
दरवाज़े के पीछे,
परदे के पीछे,
आलमारी में,
किताबों में,
और अपने औजार - बॉक्स में भी,
दिल में, दिमाग में,
पड़ोस वाली चाची के घर में,
तस्वीरों में,
पेड़ों पर,
हर जगह
ा उसे
और तो और
सपने भी खंगाल लिए,
अपनी बछिया से भी पूछा,
आईने में भी देखा
झाँका
घोसलों और बिलों में भी...
अपनी दुनिया का हर कोना छाना
नहीं मिला वो
अंत में,
मैं रोई, चिल्लाई;
ईश्वर!
बाहर निकलो न
मैं थक गयी
तुम गलत खेल रहे हो;
धमकी भी दी मैंने उसे,
मम्मी से कह दूंगी,
'कुट्टी' भी कहा
पर, वो नहीं आया...
और,

और समय बीता
मैं बड़ी हुयी
और शायद,
ईश्वर और भी बड़ा हुआ

फिर
मैं भूलने लगी,
याद नहीं रहा,
कभी
खोया था ईश्वर
मेरे ही हाथों
मेरे ही साथ खेलते हुए...

आज,
अचानक,
सोने से कुछ पहले
ख़याल आया,
याद आई उसकी,
उस ईश्वर की
जिसे मैं प्यार करती थी
मैं रोई कुछ,
कुछ मुस्कुरायी
और कुछ शरमाई
'अब बड़ी जो हो गयी थी'
सोचा,
सच! कहाँ गया ईश्वर,
काश...
आधी रात,
बिलकुल आधी,
मैंने करवट ली,
शायद ईश्वर की खिलखिलाहट
आँखें मली मैंने,
बिस्तर के नीचे झाँका,
चोटी भी नीचे लटकी,
दो आँखें चमकी
और कुछ सुन्दर, सुडौल दांत भी चमके;
मैं कुछ जानती
समझती
डरती
विश्वास करती
इससे पहले ही
वो खिसका अपनी जगह से,
पकड़ी मेरी चोटी
और कहा
'टिप...'

                       -शिखा

                                                                          दिनांक- २८.०४.२००२
 
कविता

मैंने देखा
आजकल
सब, सब लिखते हैं
ख़ासकर कवितायेँ,  
पत्र - पत्रिकाओं में प्रशंसा बटोरते हुए
शौक से दिखाते हैं
पढ़वाते हैं
और पढ़ते भी हैं, कवि - सम्मेलनों में
डायरी भरते हैं
और गर्व से फूल जाते हैं .
सच्चा झूठ
कि
कवि नहीं
लेखक नहीं
आज की दुनिया में.
हैं, बहुत हैं
क्योंकि
उनकी ज़िन्दगी में विभिन्नता है
बदलाव है,
ऐसा मैं कहती हूँ
क्योंकि ऐसा लोग कहते हैं.

मैंने देखा
सब लिखते हैं
क्योंकि
लिखने के लिए क्या चाहिए?
कुछ चिंता
कुछ दुःख
कुछ अपनी या चुरायी सोच
और
गिनती के कुछ साहित्यिक शब्द..

बहुत आसIन है,
सच!
कुछ कहना
कुछ करना
ख़ासकर, कवितायेँ लिखना..

पाठकों,
व्यंग्य में हंस दो
ताकि
मेरी ये बात
निरर्थक हो जाये,
नहीं आता मुझे कवितायेँ लिखना
मेरी कविता झूठी है.
        
                                 -शिखा