शनिवार, 23 जून 2012


                                                                          दिनांक- २८.०४.२००२
 
कविता

मैंने देखा
आजकल
सब, सब लिखते हैं
ख़ासकर कवितायेँ,  
पत्र - पत्रिकाओं में प्रशंसा बटोरते हुए
शौक से दिखाते हैं
पढ़वाते हैं
और पढ़ते भी हैं, कवि - सम्मेलनों में
डायरी भरते हैं
और गर्व से फूल जाते हैं .
सच्चा झूठ
कि
कवि नहीं
लेखक नहीं
आज की दुनिया में.
हैं, बहुत हैं
क्योंकि
उनकी ज़िन्दगी में विभिन्नता है
बदलाव है,
ऐसा मैं कहती हूँ
क्योंकि ऐसा लोग कहते हैं.

मैंने देखा
सब लिखते हैं
क्योंकि
लिखने के लिए क्या चाहिए?
कुछ चिंता
कुछ दुःख
कुछ अपनी या चुरायी सोच
और
गिनती के कुछ साहित्यिक शब्द..

बहुत आसIन है,
सच!
कुछ कहना
कुछ करना
ख़ासकर, कवितायेँ लिखना..

पाठकों,
व्यंग्य में हंस दो
ताकि
मेरी ये बात
निरर्थक हो जाये,
नहीं आता मुझे कवितायेँ लिखना
मेरी कविता झूठी है.
        
                                 -शिखा  
           

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