मेरा ईटों का बुरका...
दिनांक- ०७. ०३.२००३
एक है अपना देश
पूरा धर्मनिरपेक्ष,
शुद्ध रूप से सभी हैं
पालक अपने धर्म के
हिन्दू रखते चोटी
माथ लगाते टीका, कभी-कभी
इनकी पत्नियां पहनती हैं साड़ी
मियां रखते दाढ़ी,
इनकी बीवियां ओढ़ती हैं बुरका भी
बुरका...
जानती हूँ मैं इसे,
देखा है बुर्के को,
काला
नज़र उतारने वाला
पर, पहना नहीं कभी,
नहीं है अनुभव मुझे उस दर्द जैसी चीज़ का
जो
उस परदे से बाहर झाँकने पर
उभरता होगा
कहते हैं,
बुर्के में छुपती है
लाज
और बुरका बताता है
औरत की जगह
बुरका है मान औरत का
और है मर्दों की शान,
पर ये सब है इस्लाम के नाम
मैं 'किशोरी'
धर्म-हिन्दू
नाम-जो हो, पर हूँ पुत्री फलां की.
नहीं ओढ़ती बुरका,
नहीं करती पर्दा,
पर सीख गई हूँ सर झुकना,
पलकें झुकना,
लजाना
सवाल तब तो बड़ा है
कहाँ छुपती है लाज मेरी
जब नहीं ओढ़ती बुरका?
छोटा जवाब
एक है मकान
मेरे मम्मी-पापा का,
पक्के ईटों का,
जिसमे रहती हूँ मैं भी...
मैं किशोरी
'उनकी बेटी'
बरसों से..
स्कूल की दीवारों से निकलकर,
भीड़ भरे रास्तों से गुज़र कर
पहुचती हूँ मकान में
नियत समय पर,
गुजारती हूँ
शेष १८ घंटे
उन्ही दीवारों के बीच,
जो मजबूत हैं
मैं नहीं खेलती क्रिकेट
बाहर के मैदान में
रोज शाम को,
चूंकि,
हूँ नादाँ अभी,
नासमझ हूँ, भोली हूँ मैं
किशोरी हूँ,
थोड़ी सी सुन्दर भी
और, 'ज़माना बहुत बुरा है'...
गर्व करते हैं पापा
वो हिन्दू हैं,
इतराती हैं मम्मी
नहीं हैं वो मुस्लिम
प्रबल हैं, समर्थ हैं, बुलंद हैं
औरत रूपी मर्द हैं
नहीं ओढ़ती बुरका.
ओ सफल अधेड़ माँ !
मैं पागल किशोरी बेटी
पूछूं तुमसे
ईटों के बुर्के को ओढ़े
मैं किस धर्म का पालन करती हूँ??
- शिखा
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